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"मीडिया साथी डॉट कॉम" के इस स्तंभ "मीडिया सितारे" में प्रस्तुत हैं मीडिया के आकाश में जगमगाते मीडिया सितारों के साक्षात्कार या उनसे संबंधित आलेख।
 

कठघरे में भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह (भाग एक)

साक्षात्कारः महेन्द्र प्रताप सिंह 10.03.2011 11.30pm

(मीडिया साथी डॉट कॉम के कठघरे में इस बार हैं, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत सिंह। इस साक्षात्कार में हमने देशभर के मीडिया हाउसों की ख़बर लेने वाले यशवंत सिंह की ख़बर ली है और मीडिया साथी डॉट कॉम के स्तर के अनुरूप बिना किसी लाग-लपेट के सीधी और खरी-खरी बातें की हैं। भड़ास4मीडिया पर लगाए गए सभी आरोपों के जवाब में यशवंत ने जो कहा, उससे आप और हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु इससे कम से कम भड़ास4मीडिया से जुड़ी विचारधारा और यशवंत के पक्ष को तो समझा ही जा सकता है महेन्द्र प्रताप सिंह)

यशवंत जी, सीधे आरोपों से शुरुआत करते हैं। भड़ास एक नकारात्मक शब्द है। क्या आपको नहीं लगता कि हमें विभिन्न मुद्दों पर सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने तक सीमित रहने के बजाय समस्या के समाधान के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने चाहिए?

समाधान तो अंतिम चरण है। पर पहले तो हम लोग समस्या बताने वाले चरण से ही वंचित थे। कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था,यशवंत सिंहजो हम लोगों के सुखों-दुःखों को सामूहिक तौर पर व ईमानदारी से अभिव्यक्त करे। जब समस्या का प्रकटीकरण होता है, तभी समाधान की दिशा में क़दम बढ़ता है। और अब इसका असर दिख रहा है। पेड न्यूज़ से लेकर पत्रकारों को उत्पीड़ित करने तक में मीडिया प्रबंधन सतर्क हो गया है कि कहीं उनका भेद न खुल जाए।

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि भड़ास पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय वेबपोर्टल है और इस नाते केवल भड़ास निकालने के बजाय पत्रकारों की विचारधारा और रुचि में परिष्कार की भी आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है?

बिल्कुल सही कही कहा आपने, ये कैसे हो सकता है, इस दिशा में आपके भी सुझाव जानना चाहूँगा।

जी, इसी पर चर्चा करते हैं। बहुत से लोगों को लगता है कि भड़ास लोकप्रिय अवश्य है, किन्तु गंभीर पत्रकारिता में इसका नाम सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता और इसे एक-दूसरे की छीछालेदर करने और गाली-गलौज वाली वेबसाइट माना जाता है।

आज जिन्हें गंभीर माना जाता है, वे कितने छिछले निकले, ये आपको भी पता है। पत्रकारिता के वे बड़े नाम जो कभी गंभीरता के प्रतीक थे, राडिया कांड के बाद दलाली के प्रतीक के रूप में सामने आए। और जब भी, कुछ भी आप कभी नया करेंगे तो जमी-जमाई व्यवस्था शीघ्र आपको स्वीकार नहीं करेगी। वे आप पर तमाम तरह के आरोप व लांछन लगाएँगे। ग़नीमत है कि हम लोगों पर अभी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं। पर आज उनसे पूछिए कि भड़ास क्या है जो कभी भड़ास के आलोचक हुआ करते थे, तो वे भी मानेंगे कि भड़ास चाहे जैसा हो इसे इगनोर नहीं कर सकते।

लोगों का मानना है कि भड़ास पर कैसा भी, कुछ भी आसानी से छपवाया जा सकता है। जहाँ तक कि झूठे-सच्चे आरोप और गालियाँ तक आसानी से जगह पा जाती हैं। इस पर आपकी क्या राय है?

इसमें क्या दिक़्क़त है। कोई तो ऐसा खुला मंच हो। वैसे हम तो काफ़ी छानबीन करके छापते हैं। पर सोचिए गूगल के ब्लॉगों, बज़ व अन्य तमाम वेबसाइटों पर तो तमाम कुछ छपता रहता है। लेकिन लोग वहाँ नोटिस नहीं लेते, क्योंकि उनको लगता है कि गूगल को भला कैसे रोका जा सकता है। पर भड़ास को लेकर आप उँगली उठा देते हैं, क्योंकि भड़ास को भारत का एक बंदा चला रहा है और वह आपको फ़ोन-मोबाइल पर तत्काल उपलब्ध है, इसलिए उसे आप हड़का लोगे, मुक़दमा कर दोगे। पर आने वाले दौर में, यह जो मनुष्य व मीडिया के जनवादीकरण का दौर शुरू हुआ है, बहुत तेज़ होगा। सबका स्याह-सफ़ेद बाहर आना चाहिए और सब कुछ बेहद ट्रांसपेरेंट होना चाहिए।

भड़ास पर न तो भाषा की शुद्धता का ख़याल रखा जाता है और न ही शालीनता का। भाषा पत्रकारिता का एक आधार स्तंभ है। ऐसे में आपको नहीं लगता भड़ास पत्रकारों के भाषाई संस्कारों को परिमार्जित करने के स्थान पर उन्हें दूषित कर रहा है?

यशवंत सिंहपाखंडी क़िस्म की शालीनता से परहेज़ है हम लोगों को। ऐसे पाखंडी क़िस्म के शालीनों ने ही चुपके-चुपके सिस्टम करप्ट कर दिया है। थोड़ा बदज़ुबान ईमानदार चलेगा। और भड़ास गुस्से व विरोध का प्लेटफ़ॉर्म है तो कई बार बात कहने में उग्रता, अशालीनता दिख सकती है, पर यह उससे तो अच्छा है, जो टीवी और अख़बारों में दिखाया-छापा जा रहा है। लिंगवर्धक यंत्र, बिग बॉस, सेक्सी सीरियल्स आदि-आदि।

भड़ास पर गाली-गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग आम है। लेखों और टिप्पणियों में आपको ये खूब मिल जाएँगी। आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? जहाँ हमें सभी जगह गालियों का विरोध करना चाहिए, हम ख़ुद गालियाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

मजबूर और भूखा आदमी गाली नहीं देगा तो क्या भजन गाएगा। भरे पेट वाले सुरुचि और शालीनता की ज़्यादा बातें करते हैं पर जिनके पेट खाली हैं, सिर पर सिपाहियों के डंडे हैं, वे कैसे शांत रह सकते हैं। मीडिया में एक बड़ा हिस्सा शोषित व उत्पीड़ित है। ये जब अपनी पीड़ा लिखते-बाँटते-बताते हैं तो कई बार उग्र हो जाते हैं।

कंटेंट को लेकर भी भड़ास तथ्यपरक नहीं होता और कई अप्रामाणिक और अपुष्ट समाचार यहाँ डाल दिए जाते हैं। जिन्हें बाद में लोग ग़लत ठहराते नज़र आते हैं। (जैसे पत्रकारों द्वारा भेजे पत्रों के आधार पर ख़बरें डाल दी जाती हैं और उनका नाम आदि भी नहीं दिखाया जाता।)

पत्र प्रकाशित करना एक पक्ष होता है और उस पर आई टिप्पणियाँ दूसरा पक्ष। हम उन पत्रों को ही प्रकाशित करते हैं, जिन्हें हम लोग भी मानते हैं कि सही हैं। अगर कोई तथ्य ग़लत हो तो उसको लेकर आए स्पष्टीकरण को ससम्मान प्रकाशित करते हैं। बाक़ी जब आप काम करेंगे तो ग़लतियाँ तो होंगी ही। ग़लती वही नहीं करता, जो काम नहीं करता।

आरोप यह भी है कि भड़ास पत्रकारों में चटपटी बातों, झूठे-सच्चे गॉशिप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को बढ़ावा दे रहा है।

कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो। लेकिन अगर मीडिया में गॉशिप है, घटनाएँ हैं, सरगर्मियाँ हैं तो वे प्रकाशित होंगी ही। न्यू मीडिया के लिए मीडिया के मायने काफ़ी बदल गए हैं। हम लोग गॉसिप व चर्चाओं को भी ख़बर मानते हैं। बदलते दौर में चीज़ें बदल जाती हैं।

भड़ास पर एक कॉलम है कानाफूसी। उस पर कभी-कभी बहुत ही संवेदनशील ख़बरें बिना किसी प्रमाण और पुष्टि के डाल दी जाती हैं। जैसे, 15 फ़रवरी 2011 को हिन्दुस्तान के भदोही, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर ऑफ़िस पर भी लगेगा ताला और राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ़ आपस में भिड़े आदि। बाद में टिप्पणियों में ही लोग इन्हें ग़लत साबित करते हैं।

हिन्दुस्तान के कई ऑफ़िसों में ताले लगे हैं और कई जगह लगने बाक़ी हैं। होता क्या है कि कई बार ख़बरें छपने के बाद मीडिया हाउस कुछ निर्णयों का एक्ज़ीक्यूशन रोक देते है या टाल देते हैं ताकि साइड इफ़ेक्ट कम से कम हो। दूसरे, अगर चर्चा है तो छाप दिया, वो ग़लत है या नहीं, लोग बता रहे हैं कमेंट में तो स्पष्ट हो गया कि पूरी तस्वीर क्या है। यहाँ आपको बता दूँ कि हम लोग न तो कोई मीडिया हैं, और न कोई अनुदान लाभ प्राप्त मीडिया हाउस। हमें आप मीडिया सेंट्रिक एक इनफ़ॉरमेशन सेंटर कह सकते हैं। इसलिए तथ्यों को यशवंत सिंहसत्यापित करने का काम हमारे पाठकों का भी होता है, क्योंकि हमारे पास कोई लंबा-चौड़ा बजट व टीम नहीं है, जो हर स्टोरी पर पूरी गहराई से काम कर सके।

भड़ास वैसे तो भड़ास4मीडिया है, किन्तु यदि आपको लगता है कि कोई बात आपकी दर्शक संख्या बढ़ा सकती है, तो आप असंबद्ध बातें भी यहाँ प्रकाशित कर देते हैं। जैसे, मैं मर्द हूँ-तुम औरत, मैं भूखा हूँ-तुम भोजन हो या इसे माँ-बेटे का प्यार कहेंगे या रोमांस या सरकार चिंतित है कि सेक्स करने की उम्र ज़्यादा क्यों? इत्यादि।

भड़ास4मीडिया के पाठक आम लोग नहीं होते। पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इन पढ़े-लिखे व वयस्कों के सामने सेक्स से संबंधित बात करने में क्या दिक़्क़त है। ट्रेडिशनल मीडिया ने जो दायरे बनाए हैं, अगर उसी दायरे में हम लोग फँस जाएँगे तो फिर काहे का न्यू मीडिया। न्यू मीडिया प्रयोगात्मक है। इसीलिए प्रयोग होते रहेंगे। कभी प्रयोग अच्छे लग सकते हैं और कभी बुरे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। तो अगर किसी का कोई विचार है, जिससे आप भले असहमत हों तो उसे प्रकाशित करने में क्या दिक़्क़त। हमें विरोधी विचारों का सम्मान करना चाहिए। सीखना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए कि मनुष्य बहुत विविधता भरी चीज़ है, जिसे किसी एक डंडे से हाँक पाना अन्याय होगा। यह विविधता अगर हमारे यहाँ झलक रही है तो यह अच्छी बात है।

आरोप यह भी है कि आप बेमतलब के लेखों को सनसनीख़ेज़ बनाते हुए शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं। जैसे पत्रकार हैं, लुगाई कहाँ से लाएँ?   

ऐसा नहीं है। हेडिंग और कंटेंट में साम्य होता है। हम लोग टीवी और अख़बारों के द्वारा निर्जीव क़िस्म की हेडिंगों के आदी हैं। पर वेब पर तो प्रयोग होंगे। जिस शीर्षक का आपने ज़िक्र किया है, वह ठीक-ठाक रचना है, जिसका कंटेंट बढ़िया है। हेडिंग तो एक माध्यम होता है, कंटेंट पढ़ाने के लिए, आगे बढ़ने के लिए। इसी कारण हेडिंग में प्रयोग होते रहते हैं।

भड़ास4मीडिया एक सज्जन का नक्सलवाद पर गृहमंत्री को गरियाता हुआ एक लेख बहुत विवादास्पद हुआ था। उन सज्जन का आरोप था कि आपने पुलिस के डर से वो आलेख वेबसाइट से हटा दिया। बाद में आपने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि प्रकाशन से पूर्व आपने वह पत्र पढ़ा नहीं था। क्या ये बात वास्तव में सच थी और क्या आपको नहीं लगता कि आपको निडर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर अडिग रहना चाहिए था?

आपने पूरे प्रसंग के बारे में इसलिए जाना क्योंकि जिन्होंने विरोध किया था, उसका भी लेख हम लोगों ने छापा और अपना पक्ष भी रखा। तो ये अच्छी बात है कि हम लोग एक बेहद डेमोक्रेटिक प्लेटफ़ॉर्म बनने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ चले हैं। कई बार सबकी बात रखने के चक्कर में कुछ चाइल्डिश या एक्स्ट्रीमिस्ट क़िस्म की चीज़ें भी छप जाती हैं, जिस पर ध्यान दिलाए जाने पर उसे हटा लिया या संशोधित कर दिया जाता है। मैं हर चीज़ नहीं देख पाता, क्योंकि सब कुछ पढ़ पाना मुश्किल है एक आदमी के लिए।

क्या आपको नहीं लगता कि आप जिन वजहों से वर्तमान मीडिया हाउसों को कठघरे मे खड़ा करते हैं, वही काम भड़ास पर आप ख़ुद भी करते हैं?

जैसे बताएँ, उदाहरण दें कुछ। इतना जान लें आप कि हम लोग भी वही काम कर रहे होते तो भड़ास कभी का मर चुका होता। क्योंकि मीडिया के कई मगरमच्छ इसी फ़िराक़ में हैं कि यशवंत या भड़ास से कोई ग़लती हो, इनका कोई स्टिंग हो और इनका सत्यानाश हो जाए। हम लोग बेहद ट्रांसपेरेंट हैं। जो जानना चाहेंगे वो जानकारी पूरी ईमानदारी से आपको दी जाएगी। लेकिन यह ज़रूर मैं कह रहा हूँ कि हम लोग कहीं से कोई रजिस्टर्ड मीडिया नहीं हैं, न कोई अनुदान, भुगतान या लाभ पातें हैं सरकारों से। बावजूद इसके हम नब्बे फ़ीसदी ईमानदार हैं। 90 फ़ीसदी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करते। 10 फ़ीसदी करते हैं तो इसलिए ताकि भड़ास का सर्वाइवल बना रहे। और इस दस फ़ीसदी में भी वो लोग हैं, जिन्हें हम बेहतर मानते हैं, नया ग्रुप मानते हैं, जिनको प्रमोट करना अपना धर्म मानते हैं ताकि जमे-जमाए व बेहद करप्ट बड़े मीडिया हाउसों को चेलेंज मिल सके।

यशवंत सिंहतथाकथित न्यू मीडिया को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। न्यू मीडिया के लोगों का आरोप है कि मुख्य धारा के लोग इस क्षेत्र के अनाधिकृत मठाधीश बनने की कोशिश कर रहे हैं। आपके क्या ख़याल हैं?

बेवजह का बवाल है। जो लोग हल्ला कर रहे हैं, दरअसल वे खुद मठाधीश बनने की फ़िराक़ में हैं। आप काम करते रहिए, मठाधीश अपने आप क़िनारे लग जाएँगे। कोई बनने से मठाधीश नहीं बन जाता।

आपके मुताबिक़ न्यू मीडिया की ताक़त और कमज़ोरियाँ क्या हैं और इसका क्या भविष्य देखते हैं?

परंपरागत अख़बारों व न्यूज़ चैनलों के बाज़ार व सरकार संरक्षित होते जाने की वजह से न्यू मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है। भविष्य न्यू मीडिया का है। न्यू मीडिया का काम ही मीडिया के असली काम के रूप में प्रकट होगा। भारत में न्यू मीडिया की कमज़ोरी यही है कि अभी इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक नहीं है। जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी।

(इस इंटरव्यू का दूसरा भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

 
इस प्रस्तुति पर पाठकों की टिप्पणियाँ
 
 mrigendra kumar on  12-Mar-2011 18:09:42
जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी। (bahut khub ...sir ji ...mere gawn me maine suruwat kar di h...with broadband.. www.katiharlive.blogspot.com
 kalyan kumar on  11-Mar-2011 10:05:38
यशवंत जी का इंटरव्यू पढ़कर अच्छा लगा। उनकी बेबाकी पसंद आई। वास्तव में अब दोहरे चरित्र के साथ मीडिया नहीं चल सकता। जो है, सामने है...आप खुद तय कर लें...बहुत बढ़िया यशवंत जी...अच्छे और एकहरे विचार हैं आपके
 yogesh jadon on  12-Mar-2011 14:32:57
हिंदुस्तान की एक जलती समस्या है पाखंड, सब तरह का पाखंड। जो आदमी पक्का अहंकारी है, वह हाथ जोड़कर कहता है कि मैं तो कुछ भी नहीं हूं, आपके पैरे की धूल हूं। यशवंत ऐसे किसी भी तरह के पाखंड के खिलाफ खड़े हैं। वह जैसे दिखते हैं वैसे हैं। ऐसी शालीनता भी किस मतलब कि जो गला काट ले। एमबीए पास बड़े शालीन होते हैं मगर करते क्या हैं। उन्हें सिखाया जाता है कि कैसे जेब पर डाका डालना है।
 AYUSH SUMIT on  12-Mar-2011 15:29:11
नमस्कार,मैं शुरू से ही यशवंत जी का बड़ा फेन हूँ.पर,मीडिया साथी के इस लेख के बाद और भी हो गया हु.आज के जमाने में जब हर कोई सच कहने से पल-पल डरता हैं ,उस समय यशवंत जी जैसा आदमी मिलना नामुमकिन सा लगता हैं...मीडिया साथी पर आपने हर प्रश्न का उत्तर जितनी सही और बेबाक तरीके से दिया हैं वो काबिलेतारीफ हैं.आपने बिलकुल सही कहा की आज के जमाने में जब अपनी बात पूरी दुनिया के सामने सही तरीके से पहुँचाना नामुमकिन सा लगता हैं उस दौर में "भड़ास" पर आसानी से अपनी बातें लोग रख पाते हैं जो काफी बड़ी और ख़ुशी की बात हैं.आप सचमुच मुखोटे के पीछे जीने वाले व्यक्ति नहीं हैं ..आप जो कहते हैं सही और बिना लाग-लपेट के यानि आपके बातों में यदि गाली का प्रयोग होता हैं तो वो बुरा इसलिए नहीं लगता क्यूंकि आप दिखावटी न कर सही और जोर-दार तरीके से बात को सामने रखते हैं.मेरी भी कई बातों को आपने भड़ास पर जगह दी..जिन बातों को मैं दुनिया के सामने लाना असाध्य समझता था उन बातों को मैं भड़ास के जरिये लोगो तक ला सका और ये कोई न समझे की आपने मेरी बातों को भड़ास पर रखा इसलिए मैं आपके लिए ये कह रहा हु...मैं आपके सम्बन्ध में ये बातें सिर्फ इसलिए कह रहा हु की आप सही इन्सान हो..आप उनमे से नहीं जो पैसो के बल बिकते हैं.धन्यवाद
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